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सोयाबीन की खेती में नई तकनीक: लागत घटाने और मौसम जोखिम से बचाव पर ICAR का जोर

सोयाबीन किसानों के सामने खेती की लागत, मौसम की अनिश्चितता, खरपतवार, कीट-रोग और बाजार से जुड़ी कई चुनौतियां रहती हैं। ऐसे समय में वैज्ञानिक तकनीकों और बेहतर फसल प्रबंधन को अपनाना किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी दिशा में ICAR-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (ICAR-NSRI), इंदौर ने 5 और 6 अक्टूबर 2026 को किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें सोयाबीन उत्पादन, फसल सुरक्षा, मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण से जुड़ी तकनीकों पर जानकारी दी गई।

Raised Bed और BBF तकनीक क्यों चर्चा में है?

प्रशिक्षण में Raised Bed और Broad Bed and Furrow (BBF) पद्धति से सोयाबीन की बुवाई पर विशेष जोर दिया गया। ICAR के अनुसार इन विधियों से फसल स्थापना, जल प्रबंधन, खेती की लागत और प्रतिकूल मौसम में फसल की मजबूती से जुड़े पहलुओं में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका लाभ मिट्टी, खेत की बनावट, जल निकासी और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

खरपतवार और कीट-रोग प्रबंधन भी जरूरी

सोयाबीन में केवल अच्छी बुवाई तकनीक पर्याप्त नहीं है। किसानों को खरपतवार, कीट और रोगों की नियमित निगरानी भी करनी चाहिए। प्रशिक्षण में जैविक और अजैविक तनावों के साथ खरपतवार तथा कीट-रोग प्रबंधन की जानकारी दी गई। किसान समस्या की सही पहचान के बाद ही कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित उपाय अपनाएं।

Processing से बढ़ सकता है उपज का मूल्य

ICAR के प्रशिक्षण में सोयाबीन से सोया मिल्क, सोया पनीर, उपमा, हलवा और कुकीज जैसे उत्पाद तैयार करने का प्रदर्शन भी किया गया। इससे किसानों को कच्ची उपज की बिक्री के अलावा processing और value addition की संभावनाओं की जानकारी मिली।

छोटे किसान FPO, किसान समूह या स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों के माध्यम से ऐसे विकल्प तलाश सकते हैं। हालांकि बाजार, मशीनरी, पैकेजिंग, गुणवत्ता, बिजली और बिक्री लागत का आकलन पहले करना जरूरी है।

किसान अगली फसल के लिए क्या तैयारी करें?

किसान अपने खेत की मिट्टी, जल निकासी और पिछली फसल के अनुभव की समीक्षा करें। अगली सोयाबीन फसल के लिए प्रमाणित बीज, क्षेत्र के अनुकूल बुवाई पद्धति और संतुलित पोषण प्रबंधन पर ध्यान दें।

निष्कर्ष: सोयाबीन में लागत और मौसम संबंधी जोखिमों का प्रबंधन किसी एक तकनीक से नहीं होता। बेहतर बुवाई पद्धति, जल प्रबंधन, नियमित फसल निगरानी और value addition को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाना अधिक उपयोगी हो सकता है।

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