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पराली प्रबंधन पर जिला स्तर पर कार्रवाई तेज करने के निर्देश, किसानों को मिलेंगे वैकल्पिक उपाय

धान की कटाई के मौसम में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने जिला प्रशासन को निगरानी और जमीनी स्तर पर प्रबंधन मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कृषि एवं किसान कल्याण और पर्यावरण मंत्रालयों की संयुक्त समीक्षा बैठक में राज्यों से पराली प्रबंधन के लिए तेजी से काम करने को कहा गया। उत्तर प्रदेश भी बैठक में शामिल राज्यों में था।

जिला प्रशासन को क्या करना है?

सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, जिलाधिकारियों को संबंधित विभागों के साथ बैठक कर स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजना बनाने, उपलब्ध कृषि मशीनों का उपयोग सुनिश्चित करने और पराली को उपयोगी संसाधन में बदलने के उपाय लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। इसका उद्देश्य पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करना और किसानों को व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना है।

किसान पराली का उपयोग कैसे करें?

पराली जलाने के बजाय किसान इन विकल्पों पर विचार कर सकते हैं:

*खेत में प्रबंधन: उपयुक्त मशीनों की मदद से फसल अवशेषों को खेत में मिलाएं या अगली फसल की बुवाई के अनुकूल व्यवस्थित करें।

*मशीन किराये पर लें: कृषि विभाग या कस्टम हायरिंग सेंटर से मशीन की उपलब्धता और किराये की जानकारी लें।

*बिक्री की संभावना देखें: स्थानीय स्तर पर पराली का उपयोग बायोमास, बायोगैस या अन्य ऊर्जा उत्पादन में हो सकता है। उत्तर प्रदेश का बायोफीडस्टॉक पोर्टल किसानों, एफपीओ और परियोजना संचालकों को जोड़ने के लिए बनाया गया है।

*पहले से योजना बनाएं: कटाई से पहले मशीन, संग्रह और परिवहन की व्यवस्था तय करें।

किसानों के लिए जरूरी सलाह

पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी के उपयोगी जैविक घटकों को नुकसान पहुंच सकता है। किसान अपने जिले के कृषि अधिकारी से उपलब्ध मशीनों, सहायता और स्थानीय नियमों की पुष्टि करें। किसी अनुदान या खरीद की गारंटी मानकर खर्च न करें।

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