अक्टूबर में बारिश और लगातार नमी के बाद धान की फसल में रोग और कीटों की निगरानी बढ़ाना जरूरी हो जाता है। खासकर जिन खेतों में पानी जमा रहा हो या फसल का canopy अधिक घना हो, वहां कुछ रोग और कीटों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। ऐसे समय में किसान बिना पहचान के दवा छिड़कने के बजाय पहले खेत की स्थिति की जांच करें।
बारिश के बाद धान में कौन से रोग-कीट दिख सकते हैं?
ICAR-NIBSM की हालिया सलाह के अनुसार अधिक आर्द्रता और घने फसल आवरण की स्थिति में शीथ ब्लाइट और ब्लास्ट जैसे रोग तेजी से विकसित हो सकते हैं। वहीं प्रजनन अवस्था के आसपास येलो स्टेम बोरर और ब्राउन प्लांट हॉपर की नियमित निगरानी भी जरूरी है। स्टेम बोरर से प्रभावित पौधों में सफेद बालियां दिखाई दे सकती हैं, जबकि ब्राउन प्लांट हॉपर के अधिक प्रकोप से पौधों के समूह सूखने जैसी स्थिति बन सकती है।
किसान किन लक्षणों पर रखें नजर?
खेत की नियमित जांच करते समय पत्तियों और पत्ती के आवरण पर असामान्य धब्बे, तने पर क्षति, पौधों का सूखना तथा बालियों में असामान्य लक्षण देखें। धान के पौधों के निचले हिस्से और तने के आसपास कीटों की मौजूदगी भी जांचें।
यदि खेत में अनावश्यक पानी जमा है तो जहां संभव हो सुरक्षित जलनिकासी करें। साथ ही अत्यधिक नाइट्रोजन के इस्तेमाल से बचें, क्योंकि अनुकूल मौसम में असंतुलित पोषण कुछ रोग और कीट समस्याओं को बढ़ा सकता है।
बिना पहचान के दवा का छिड़काव न करें
रोग या कीट का सही कारण पता किए बिना फफूंदनाशक या कीटनाशक का इस्तेमाल न करें। लक्षण स्पष्ट नहीं होने पर कृषि विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र या स्थानीय कृषि विभाग से सलाह लें।
जरूरत पड़ने पर केवल फसल और संबंधित रोग या कीट के लिए अनुशंसित कृषि रसायन का इस्तेमाल करें और लेबल पर दिए निर्देश व निर्धारित मात्रा का पालन करें। ICAR-NIBSM ने अनावश्यक pesticide mixtures और बार-बार एक ही chemical group के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी है।
नियमित निगरानी से समय पर मिलेगी जानकारी
बारिश रुकने के बाद भी खेत में नमी और रोग-कीट की स्थिति पर नजर रखें। सप्ताह में कई बार फसल का निरीक्षण करने से शुरुआती लक्षणों की पहचान में मदद मिल सकती है। ICAR की IPM approach भी निगरानी, सही पहचान और जरूरत के अनुसार नियंत्रण पर जोर देती है।
निष्कर्ष: बारिश के बाद धान में रोग और कीट का खतरा खेत की स्थिति और मौसम के अनुसार बदल सकता है। जल प्रबंधन, संतुलित पोषण, नियमित निगरानी और सही पहचान के आधार पर प्रबंधन करने से फसल नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।



