मौसम में बदलाव के कारण सूखा, अधिक गर्मी, बाढ़, लवणता और दूसरी जलवायु चुनौतियां खेती को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में ऐसी फसल किस्मों का महत्व बढ़ जाता है, जो अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में बेहतर अनुकूलन की क्षमता रखती हों।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार पिछले एक वर्ष में 44 फसलों में 386 सुधरी हुई किस्में विकसित की गईं। इनमें 94 प्रतिशत किस्में climate-resilient और 29 प्रतिशत biofortified थीं।
Climate-Resilient Seeds क्या हैं?
Climate-resilient किस्में ऐसी कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित की जाती हैं, जहां सूखा, गर्मी, बाढ़, लवणता या दूसरे जलवायु तनाव का खतरा हो सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2025 के बीच 3,236 field crop varieties जारी और अधिसूचित हुईं, जिनमें 2,996 climate-resilient varieties थीं। इनमें सूखा, बाढ़, लवणता और गर्मी जैसी परिस्थितियों को सहन करने वाली किस्में शामिल हैं।
किसानों को क्या फायदा हो सकता है?
ऐसी किस्में मौसम संबंधी जोखिमों के बीच फसल चयन के अतिरिक्त विकल्प दे सकती हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में जलवायु जोखिम के अनुसार खेती की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि किसी भी किस्म से हर मौसम में समान उत्पादन की गारंटी नहीं होती।
बीज खरीदते समय क्या देखें?
किसान अपने क्षेत्र की मिट्टी, पानी, मौसम और फसल अवधि को ध्यान में रखकर किस्म का चुनाव करें। प्रमाणित बीज को प्राथमिकता दें और KVK, कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय की स्थानीय सलाह देखें। केवल “climate-resilient” नाम देखकर बिना क्षेत्रीय उपयुक्तता जांचे बीज खरीदना उचित नहीं है।
Climate-Resilient Seeds खेती के जोखिम को कम करने का एक महत्वपूर्ण साधन हो सकते हैं, लेकिन इनके साथ सही कृषि तकनीक और स्थानीय मौसम सलाह भी जरूरी है।



