मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया, फफूंद और दूसरे सूक्ष्मजीव फसल के पोषण और जैविक पदार्थों के विघटन में अहम भूमिका निभाते हैं। किसी वातावरण में रहने वाले सूक्ष्मजीवों के समुदाय और उनके आपसी संबंधों को माइक्रोबायोम कहा जाता है। कुछ सूक्ष्मजीव लाभकारी होते हैं, जबकि कुछ रोग भी पैदा कर सकते हैं।
यूपी सरकार की माइक्रोबायोम पहल क्या है?
उत्तर प्रदेश सरकार ने Uttar Pradesh State Specific Note on Microbiome Technologies नाम से एक मसौदा तैयार किया है। 22 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, इसमें स्वास्थ्य सेवाओं, जल प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और टिकाऊ कृषि में माइक्रोबायोम तकनीक के संभावित उपयोग पर विचार किया गया है। मसौदे को मुख्यमंत्री की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाना था। इसलिए इसे अभी लागू हो चुकी किसान योजना या घोषित सब्सिडी नहीं माना जाना चाहिए।
किसानों के लिए इसका क्या महत्व है?
माइक्रोबायोम पर शोध से लाभकारी सूक्ष्मजीवों की भूमिका समझने, पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधारने और फसल प्रबंधन की बेहतर तकनीक विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ मिट्टी, फसल और तकनीक के परीक्षण परिणामों पर निर्भर करेगा।
मऊ में पहले से क्या काम हो रहा है?
मऊ स्थित ICAR-राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो (ICAR-NBAIM) ने जून 2026 में ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को लाभकारी सूक्ष्मजीवों और जैव उर्वरकों के बारे में जानकारी दी। कार्यक्रमों में Bio-NPK और Bio-Phos जैसे उत्पादों के इस्तेमाल का प्रदर्शन भी किया गया। ये गतिविधियां संस्थान के किसान-जागरूकता प्रयासों का हिस्सा हैं, नई राज्य माइक्रोबायोम नीति के तहत शुरू हुई योजना नहीं।
किसान अभी क्या करें?
मिट्टी की जांच कराएं, Soil Health Card की सिफारिशों के अनुसार पोषक तत्व दें और जैव उर्वरक का उपयोग फसल व उत्पाद के निर्देशों के अनुसार करें। किसी उत्पाद से निश्चित उपज बढ़ने या रासायनिक खाद पूरी तरह बंद करने की गारंटी न मानें।
निष्कर्ष: माइक्रोबायोम तकनीक टिकाऊ खेती के लिए संभावनाएं रखती है, लेकिन नई सरकारी पहल की मंजूरी और क्रियान्वयन की पुष्टि होने तक किसानों को मौजूदा प्रमाणित कृषि सलाह अपनानी चाहिए।



