खेती में पानी का सही उपयोग फसल की लागत और मिट्टी की नमी के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग ऐसी तकनीकें हैं, जो उपयुक्त फसलों और परिस्थितियों में पानी की बर्बादी कम करने में मदद कर सकती हैं।
ड्रिप सिंचाई से पानी का बेहतर उपयोग
ड्रिप सिंचाई में पाइप और ड्रिपर के माध्यम से पानी धीरे-धीरे पौधों के जड़ क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है। इससे खेत में पानी का अनावश्यक बहाव कम हो सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार, सूक्ष्म सिंचाई की जल उपयोग दक्षता पारंपरिक सतही सिंचाई से अधिक हो सकती है। हालांकि, वास्तविक बचत मिट्टी, फसल और सिस्टम के रखरखाव पर निर्भर करती है।
किसान फसल की अवस्था, मौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार सिंचाई तय करें। ड्रिपर और फिल्टर की नियमित सफाई करें, ताकि पानी का प्रवाह बाधित न हो।
मल्चिंग से मिट्टी की नमी कैसे बचाएं?
मल्चिंग में मिट्टी की सतह को सूखी घास, पत्तियों, फसल अवशेष या उपयुक्त प्लास्टिक मल्च से ढका जाता है। इससे पानी का वाष्पीकरण कम करने, खरपतवार नियंत्रित करने और मिट्टी के तापमान को संतुलित रखने में मदद मिल सकती है।
जैविक मल्च धीरे-धीरे सड़कर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ भी बढ़ा सकता है। प्लास्टिक मल्च चुनते समय फसल और स्थानीय मौसम के अनुकूल सामग्री लें तथा उपयोग के बाद उसका उचित निपटान करें।
किसानों के लिए पांच जरूरी सुझाव
1. ड्रिप सिस्टम फसल और खेत की जरूरत के अनुसार लगवाएं।
2. मिट्टी की नमी देखकर सिंचाई का समय तय करें।
3. बारिश के बाद सिंचाई की जरूरत दोबारा जांचें।
4. मल्च को पौधे के तने से सटाकर न रखें।
5. लागत और उपलब्ध सरकारी सहायता के लिए जिला कृषि या उद्यान विभाग से जानकारी लें।
निष्कर्ष: ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग का उचित संयोजन पानी के बेहतर प्रबंधन में सहायक हो सकता है। अपने खेत में इसे अपनाने से पहले कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से फसल और मिट्टी के अनुसार सलाह लें।



