फसल में पीलापन, कमजोर बढ़वार या कम उत्पादन दिखने पर तुरंत अधिक खाद डालना सही समाधान नहीं है। पोषक तत्वों की कमी के अलावा पानी का जमाव, जड़ों को नुकसान, कीट-रोग और मौसम की प्रतिकूलता भी फसल को प्रभावित कर सकती है। इसलिए खाद बढ़ाने से पहले समस्या का कारण समझना जरूरी है।
मिट्टी की जांच से क्या जानकारी मिलती है?
भारत सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत मिट्टी के पोषक तत्वों और कुछ अन्य गुणों की जाँच की जाती है। रिपोर्ट में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर, कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों, जैविक कार्बन, pH और विद्युत चालकता जैसे मानकों की जानकारी मिल सकती है। इसके आधार पर खेत और फसल के अनुसार उर्वरक तथा मिट्टी सुधार की सिफारिशें दी जाती हैं।
मिट्टी की जाँच से किसान यह समझ सकते हैं कि किन पोषक तत्वों की जरूरत है और कहाँ अतिरिक्त खाद डालने से बचा जा सकता है। इससे अनावश्यक खर्च घटाने और मिट्टी की सेहत बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक बचत खेत की स्थिति और पहले किए जा रहे उर्वरक उपयोग पर निर्भर करती है।
खाद पर खर्च नियंत्रित करने के 5 तरीके
1. मिट्टी की जाँच कराएं: नजदीकी कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला से संपर्क करें।
2. रिपोर्ट के अनुसार खाद डालें: मात्रा फसल, मिट्टी की स्थिति और कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार तय करें।
3. फसल के लक्षणों की जाँच करें: पीलापन या कम बढ़वार होने पर सिंचाई, जल निकासी, जड़ों और कीट-रोग की स्थिति भी देखें।
4. संतुलित पोषण अपनाएं: रासायनिक उर्वरकों और जैविक खाद का उपयोग जरूरत और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें।
5. खर्च का रिकॉर्ड रखें: खाद की मात्रा, कीमत और फसल की स्थिति लिखें। इससे अगले सीजन की योजना बनाने में मदद मिलेगी।
मिट्टी की जाँच कहाँ कराएं?
किसान मृदा स्वास्थ्य कार्ड पोर्टल या स्थानीय कृषि कार्यालय से मिट्टी परीक्षण की सुविधा और नजदीकी प्रयोगशाला की जानकारी ले सकते हैं। मिट्टी का नमूना सही तरीके से लेना भी जरूरी है, इसलिए नमूना लेने की विधि संबंधित विशेषज्ञ से समझें।



