उर्वरक उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में ग्रीन अमोनिया तकनीक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की 9 अक्टूबर को जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, 10 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मोदीपुरम, मेरठ स्थित ICAR-IIFSR में कृषि तकनीक, खाद्य प्रणाली और पोषण से जुड़े कार्यक्रम के दौरान इस तकनीक का प्रदर्शन प्रस्तावित था।
क्या है ग्रीन अमोनिया तकनीक?
पारंपरिक अमोनिया उत्पादन में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल हो सकता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन होता है। ग्रीन अमोनिया बनाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार हाइड्रोजन का उपयोग किया जा सकता है। अमोनिया उर्वरक उद्योग का एक महत्वपूर्ण कच्चा पदार्थ है।
इस तकनीक का उद्देश्य उर्वरक उत्पादन की प्रक्रिया को कम-कार्बन बनाना है। हालांकि, इसके व्यापक इस्तेमाल के लिए स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता, उत्पादन लागत, संयंत्रों और आपूर्ति व्यवस्था जैसी चुनौतियों पर काम करना होगा।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?
भारत में उर्वरक उत्पादन और आपूर्ति कृषि व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। ग्रीन अमोनिया का व्यावसायिक उपयोग बढ़ने पर उर्वरक उद्योग के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन तकनीक का प्रदर्शन अपने आप यह साबित नहीं करता कि खाद की कीमत घटेगी या किसानों को तुरंत कोई नया उत्पाद मिलेगा।
किसानों को अभी क्या करना चाहिए?
*खाद की कीमत और उपलब्धता के लिए आधिकारिक घोषणाओं पर नजर रखें।
*उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें।
*नई तकनीक से जुड़ी लागत, उत्पादन और व्यावसायिक उपलब्धता की पुष्टि होने तक किसी निश्चित लाभ का अनुमान न लगाएं।
निष्कर्ष: मेरठ में प्रस्तावित प्रदर्शन कृषि और उर्वरक क्षेत्र में स्वच्छ तकनीक की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका वास्तविक लाभ आगे की तकनीकी प्रगति, लागत और व्यावसायिक उपयोग पर निर्भर करेगा।



