जिमीकंद, जिसे सूरन या ओल भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण कंद वाली फसल है। इसका उपयोग सब्जी बनाने में किया जाता है। इसकी खेती से पहले स्वस्थ बीज-कंद, उपयुक्त किस्म और स्थानीय बाजार की मांग का आकलन करना जरूरी है।
जिमीकंद की प्रमुख किस्में
गजेंद्र और श्री पद्मा इसकी जानी-पहचानी किस्में हैं। ICAR-केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान के अनुसार, श्री पद्मा किस्म की परिपक्वता अवधि लगभग 8–9 महीने है। इसकी वास्तविक उपज मिट्टी, मौसम और खेती की देखभाल पर निर्भर करती है।
खेत की तैयारी और रोपाई
जिमीकंद के लिए उपजाऊ, भुरभुरी और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी उपयुक्त रहती है। खेत में पानी जमा होने से कंद सड़ने का खतरा बढ़ सकता है। सामान्यतः फरवरी–मार्च या अप्रैल–मई में रोपण किया जाता है, लेकिन सही समय क्षेत्र की जलवायु और वर्षा पर निर्भर करता है।
रोपण के लिए स्वस्थ कंद या लगभग 750–1,000 ग्राम के कंद-टुकड़े इस्तेमाल किए जा सकते हैं। हर टुकड़े में अंकुर निकलने वाला मध्य भाग होना चाहिए। एक सामान्य अनुशंसा के अनुसार, 60×60×45 सेंटीमीटर के गड्ढे बनाकर उनमें ऊपर की उपजाऊ मिट्टी और लगभग 2 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद मिलाई जा सकती है।
सिंचाई और देखभाल
रोपण के बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें। बारिश न होने पर जरूरत के अनुसार सिंचाई करें, लेकिन जलभराव से बचें। सूखी पत्तियों या उपयुक्त जैविक सामग्री से मल्चिंग करने पर मिट्टी की नमी बचाने और खरपतवार नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। समय पर निराई-गुड़ाई करें और कंदों में सड़न या कीट के लक्षण दिखने पर कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें।
फसल की खुदाई कब करें?
जिमीकंद की फसल सामान्यतः 8–9 महीने में तैयार हो सकती है। पत्तियों का पीला पड़ना और सूखना खुदाई के समय का संकेत हो सकता है। कंद निकालते समय उन्हें चोट से बचाएं।
किसानों के लिए सलाह: उत्तर प्रदेश में बड़े क्षेत्र में खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से किस्म, रोपण समय और खाद की मात्रा की पुष्टि करें।



