धान, गेहूँ और दूसरी फसलों की कटाई के बाद बचने वाले अवशेषों को जलाने के बजाय उपयोगी संसाधन बनाया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की अक्टूबर 2026 की खेती पत्रिका में भी पराली से बायोचार बनाने पर लेख प्रकाशित हुआ है। किसान कच्चे फसल अवशेष, कम्पोस्ट और बायोचार के बीच अंतर समझकर अपने खेत के लिए उपयुक्त विकल्प चुन सकते हैं।
कच्चे अवशेष, कम्पोस्ट और बायोचार में क्या अंतर है?
1. कच्चे फसल अवशेष: धान का पुआल, गेहूँ के डंठल और अन्य बचे पौधों के हिस्से कच्चे अवशेष हैं। इन्हें उपयुक्त मशीनों की मदद से खेत में मिलाया या मल्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अगली फसल की बुवाई से पहले इनके विघटन और मिट्टी की स्थिति का ध्यान रखें।
2. कम्पोस्ट: फसल अवशेषों को गोबर और उपयुक्त जैविक सामग्री के साथ सूक्ष्मजीवों की मदद से सड़ाकर कम्पोस्ट बनाया जाता है। तैयार कम्पोस्ट मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में मदद कर सकता है। इसे पूरी तरह तैयार होने के बाद उपयोग करें।
3. बायोचार: यह फसल अवशेष जैसे जैविक पदार्थों को नियंत्रित, कम-ऑक्सीजन वाली परिस्थिति में गर्म करके बनाया जाने वाला कार्बन-समृद्ध पदार्थ है। उचित गुणवत्ता और मिट्टी की परिस्थितियों में यह जल धारण और पोषक तत्वों के प्रतिधारण में सहायक हो सकता है।
बायोचार बनाते समय सुरक्षा क्यों जरूरी है?
बायोचार बनाने में तापमान, ऑक्सीजन की उपलब्धता और प्रक्रिया पर नियंत्रण जरूरी है। खुले में पराली जलाने से बायोचार की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होती और धुआँ तथा आग का खतरा रहता है। बिना उपयुक्त उपकरण, प्रशिक्षण और सुरक्षा व्यवस्था के घर पर इसे बनाने की कोशिश न करें।
किसानों के लिए सलाह: कम्पोस्ट या बायोचार का उपयोग करने से पहले कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से मिट्टी की जाँच और फसल की जरूरत के अनुसार सलाह लें। बायोचार रासायनिक उर्वरकों का पूर्ण विकल्प नहीं है।



