लाल मरसा साग की खेती से किसानों को मिल सकता है अतिरिक्त आय का अवसर
लाल मरसा साग, लाल चौलाई (Amaranthus tricolor) का एक प्रकार है। इसकी पत्तियों का लाल या बैंगनी रंग इसे दूसरी हरी पत्तेदार सब्जियों से अलग बनाता है। कम अवधि में तैयार होने वाली इस फसल को स्थानीय बाजार और घरेलू उपयोग के लिए उगाया जा सकता है।
बुवाई का समय और संभावित पैदावार
उत्तर भारत में चौलाई की पत्तेदार फसल के लिए सामान्यतः फरवरी–मार्च और जून–जुलाई में बुवाई की जाती है। हालांकि, सही समय स्थानीय मौसम और किस्म पर निर्भर करता है। गर्म जलवायु में इसकी बढ़वार अच्छी हो सकती है। खेत में पानी निकासी की व्यवस्था रखना जरूरी है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत केंद्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने ‘CIARI Lal Marsha’ नामक चयन विकसित किया है। संस्थान के प्रकाशित विवरण के अनुसार, अंडमान-निकोबार की उष्ण और आर्द्र परिस्थितियों में इसकी पहली कटाई लगभग 25–30 दिन में और संभावित उपज 14–16 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। उत्तर प्रदेश में यही परिणाम मिलने की गारंटी नहीं है।
उपभोक्ताओं के लिए क्या हैं फायदे?
लाल मरसा में एंथोसायनिन जैसे रंगद्रव्य और कैरोटिनॉयड पाए जाते हैं। चौलाई की पत्तियां विटामिन और खनिजों का भी स्रोत हैं। इन्हें साग और अन्य पके व्यंजनों में शामिल किया जा सकता है। संतुलित आहार के हिस्से के रूप में यह भोजन में पोषक तत्वों की विविधता बढ़ाती है।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
बड़े क्षेत्र में बुवाई से पहले प्रमाणित बीज, स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र की सिफारिश और बाजार की मांग की जांच करें। संभावित पैदावार को निश्चित मुनाफा न मानें; लागत और स्थानीय बिक्री मूल्य का हिसाब जरूर लगाएं।



