खेत में फसल उगाने के साथ बिजली उत्पादन भी संभव है। एग्रीवोल्टाइक तकनीक (Agrivoltaics) इसी अवधारणा पर आधारित है, जिसमें एक ही जमीन पर खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन किया जाता है। 21 से 23 अक्टूबर 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में सातवाँ AgriVoltaics World Conference आयोजित हो रहा है। इसमें कृषि और सौर ऊर्जा के संयुक्त उपयोग पर चर्चा हो रही है।
क्या है एग्रीवोल्टाइक तकनीक?
इस व्यवस्था में सोलर पैनल ऊँचे ढाँचे पर या उचित दूरी पर लगाए जाते हैं, ताकि उनके नीचे अथवा बीच की जगह में खेती की जा सके। पैनलों की ऊँचाई, दूरी और दिशा फसल की जरूरत, उपलब्ध धूप और कृषि मशीनों की आवाजाही को ध्यान में रखकर तय की जाती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसार, 18 दिसंबर 2025 को ICAR-IARI, नई दिल्ली में 100 किलोवाट-पीक क्षमता की एग्री-PV पायलट परियोजना का उद्घाटन किया गया था। इसमें सौर ऊर्जा उत्पादन के साथ विभिन्न फसलों की खेती के उपयुक्त तरीकों का अध्ययन किया जाना है।
किसानों को क्या फायदे और चुनौतियाँ हैं?
एग्रीवोल्टाइक से बिजली उत्पादन के जरिए अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है। कुछ परिस्थितियों में आंशिक छाया फसलों को तेज धूप और गर्मी से राहत दे सकती है। लेकिन अधिक छाया से फसल की वृद्धि और उपज घटने का जोखिम भी रहता है। ऊँचे ढाँचे, स्थापना, रखरखाव और बिजली ग्रिड से जुड़ने की लागत भी अधिक हो सकती है।
निवेश से पहले क्या जाँचें?
किसान अपनी फसल की धूप संबंधी जरूरत, मिट्टी, सिंचाई, मशीनों की आवाजाही, ढाँचे की लागत और संभावित बिजली बिक्री का आकलन करें। बिजली खरीदने वाली कंपनी की शर्तें, कनेक्शन की उपलब्धता, ऋण, बीमा और निवेश की वसूली में लगने वाला समय भी जाँचें।
केंद्र सरकार ने PM-KUSUM के अगले चरण में एग्रीवोल्टाइक के लिए विशेष घटक की घोषणा की है। हालांकि, 19 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार प्रोत्साहन व्यवस्था और उसके स्वरूप पर विचार जारी था। इसलिए किसी निश्चित सब्सिडी या सहायता राशि को उपलब्ध लाभ न मानें। आवेदन से पहले संबंधित मंत्रालय और राज्य की आधिकारिक अधिसूचना देखें।
निष्कर्ष: एग्रीवोल्टाइक तकनीक खेती और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को जोड़ने का विकल्प है, लेकिन इसकी सफलता सही डिजाइन, फसल के चयन और आर्थिक आकलन पर निर्भर करती है। निवेश से पहले कृषि विशेषज्ञ और संबंधित सौर ऊर्जा विभाग से सलाह लें।



