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बैकयार्ड मुर्गी पालन (Poultry Farming): कभी खेतिहर मज़दूरी किया करती थी पुष्पा, मुर्गी की ये उन्नत नस्ल बनी कमाई का ज़रिया

बैकयार्ड मुर्गी पालन के लिए सही नस्ल की जानकारी होना बहुत ज़रूरी है। क्या वो मुर्गी उस क्षेत्र के हिसाब से ठीक है या नहीं, इसके बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। जानिए कैसे तेलंगाना की रहने वाली पुष्पा ने मुर्गी की उन्नत नस्ल से अपने आप को आत्मनिर्भर बनाया।

ग्रामीण इलाकों में अतिरिक्त आमदनी के लिए मुर्गी पालन एक बेहतरीन ज़रिया है। आमतौर पर लोग आंगन या घर के पीछे मुर्गियां पालते हैं, जिसमें किसी तरह की अतिरिक्त लागत नहीं आती। इस तरह से कम लागत में आमदनी बढ़ाने का यह अच्छा तरीका है, लेकिन अधिक मुनाफ़े के लिए मुर्गी की बेहतरीन किस्म की जानकारी ज़रूरी है। बैकयार्ड मुर्गी पालन के लिए कौन सी मुर्गी उपयुक्त है? उसकी ख़ासियत क्या है? कैसा उसका बाज़ार है? इन सबके बारे में आप इस लेख में पढ़ेंगे। तेलंगाना के यादाद्री-भोंगिर ज़िले की रहने वाली खेतिहर मज़दूर चिलिवेरी पुष्पा ने बैकयार्ड मुर्गी पालन से अपनी आजीविका में न सिर्फ़ सुधार किया, बल्कि खुद को आत्मनिर्भर बनाया।

राजश्री किस्म की मुर्गियां उपलब्ध कराई गई

पेंचकल पहाड़ गांव से ताल्लुक रखने वाली पुष्पा का परिवार दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर है। उन्होंने खुद खेतिहर मज़दूर के रूप में काम किया। उनकी मेहनत और लगन को देखते हुए एक स्थानीय पशु चिकित्सक ने उन्हें राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत बैकयार्ड पोल्ट्री यूनिट योजना के लिए चुना। इस योजना के तहत उन्हें दो बैच में 15 नर और 30 मादा के अनुपात में राजश्री किस्म की 45 मुर्गियां उपलब्ध कराई गईं।

बैकयार्ड मुर्गी पालन से आर्थिक स्थिति में सुधार

उन्होंने वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से मुर्गियों का ख़ास ख्याल रखा। इससे जल्द ही उनका पोल्ट्री व्यवसाय फलने-फूलने लगा। 8 से 10 रूपये प्रति अंडा और प्रति पक्षी को 600 रुपये की दर से बेचना शुरू कर दिया। बिक्री के अलावा, अंडे और मांस के सेवन से उनके परिवार को भी अच्छा पोषण मिलने लगा। मुर्गी पालन व्यवसाय से मिले मुनाफ़े से उत्साहित होकर पुष्पा और उनके परिवार ने ब्रीडिंग पर भी काम किया। फर्टाइल अंडों की संख्या बढ़ाई। अभी उनके बैकयार्ड मुर्गी पालन यूनिट में 100 मुर्गिया हैं, लेकिन अतिरिक्त आमदनी के लिए वह इनकी संख्या और बढ़ाने की योजना बना रही हैं।

राजश्री किस्म की ख़ासियत

राजश्री किस्म को ख़ासतौर पर ग्रामीण इलाकों के लिए विकसित किया गया है। ये किस्म बैकयार्ड मुर्गीपालन के लिए उपयुक्त बताई गई है। हैदराबाद स्थित श्री पी.वी. नरसिम्हा राव तेलंगाना स्टेट यूनिवर्सिटी फ़ॉर वेटरनरी, एनिमल एंड फ़िशरी साइंसेज़, (SPVNRTSUVAS) ने इसे विकसित किया है।

अन्य मुर्गियों की तुलना में राजश्री किस्म की मुर्गी रोगों के प्रति कम संवेदनशील होती हैं। यह रंग-बिरंगी, खुद प्रजनन करने में सक्षम और अच्छी शारीरिक सरंचना वाली होती हैं। एक मुर्गी साल में 150 अंडे देती है और 18 हफ़्ते की उम्र में इनके शरीर का वज़न लगभग 1.5 किलो तक हो जाता है। ये नस्ल 5 से 6 महीनों में अंडे देना शुरू कर देती हैं। ये दिखने में देसी मुर्गी की तरह होती हैं। इसलिए यह ब्रॉयलर से दोगुनी कीमत में बिकती हैं। साथ ही इसके अंडे भी भूरे रंग के होते हैं, जो सफेद अंडे से महंगे बिकते हैं। यानी इस किस्म को पालकर किसान अच्छा-खासा मुनाफ़ा कमा सकते हैं।

बैकयार्ड मुर्गी पालन किफ़ायती 

आमतौर पर पोल्ट्री व्यवसाय में मुर्गियों के दाने पर ही कुल लागत का 70 फ़ीसदी हिस्सा खर्च हो जाता है, लेकिन अगर आप बैकयार्ड मुर्गी पालन यानी घर के पीछे मुर्गीपालन कर रहे हैं तो मुर्गियां कीड़े, घर का बचा खाना, अनाज आदि खाती हैं, जिसपर अतिरिक्त खर्च नहीं होता। साथ ही उनके रहने के लिए भी किसी तरह की अलग व्यवस्था करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हां, अगर कोई व्यवसायिक स्तर पर मुर्गीपालन कर रहा है तो उसे मुर्गियों के भोजन की अतिरिक्त व्यवस्था करनी होगी और रहने के लिए शेड भी बनाना होगा।

 

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