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बुलंदशहर में ग्रीन अमोनिया का खेत परीक्षण शुरू, यूपी के 7 जिलों में परखी जाएगी नई तकनीक

खेती में नाइट्रोजन के बेहतर इस्तेमाल और उर्वरक प्रबंधन की लागत का मूल्यांकन करने के लिए उत्तर प्रदेश में ग्रीन अमोनिया का खेत परीक्षण शुरू किया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नेतृत्व में इस परियोजना की शुरुआत 29 अक्टूबर को बुलंदशहर जिले के कहिरा गांव, दरियापुर में फील्ड डेमोंस्ट्रेशन के साथ हुई। यह परियोजना उत्तर प्रदेश के सात जिलों में संचालित की जा रही है। इसके तहत वैज्ञानिक फसल उत्पादन और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता पर इस तकनीक के प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

क्या है ग्रीन अमोनिया?

ग्रीन अमोनिया का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार हाइड्रोजन और हवा से प्राप्त नाइट्रोजन की मदद से किया जाता है। पारंपरिक अमोनिया उत्पादन में मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल होता है, जबकि ग्रीन अमोनिया के उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। इससे उत्पादन प्रक्रिया के दौरान होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की संभावना रहती है।

खेतों में कैसे होगा इसका इस्तेमाल?

ICAR के अनुसार, इस तकनीक में विशेष उपकरणों की मदद से अमोनिया को मिट्टी की निर्धारित गहराई में पहुंचाया जाता है। इसका उद्देश्य फसल की जड़ों के आसपास नाइट्रोजन उपलब्ध कराना और पोषक तत्वों के नुकसान को कम करने की संभावना का मूल्यांकन करना है।

इस प्रक्रिया में विशेष उपकरण, प्रशिक्षित ऑपरेटर और सुरक्षा संबंधी सावधानियां जरूरी हैं। अमोनिया का इस्तेमाल सामान्य यूरिया की तरह हाथ से खेत में छिड़ककर नहीं किया जाता।

सात जिलों में होगा वैज्ञानिक परीक्षण

इस परियोजना का नेतृत्व ICAR-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (ATARI), जोन-III, कानपुर कर रहा है। इसमें ICAR-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (IIFSR), मेरठ सहयोग कर रहा है।

कृषि वैज्ञानिक इस परीक्षण के दौरान फसल की वृद्धि, उपज, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता, उर्वरक की जरूरत और खेती की लागत का रिकॉर्ड तैयार करेंगे। इसके परिणामों की तुलना पारंपरिक यूरिया आधारित नाइट्रोजन प्रबंधन से की जाएगी।

किसानों के लिए क्या है इसका महत्व?

ग्रीन अमोनिया का परीक्षण भविष्य में नाइट्रोजन प्रबंधन के नए विकल्प तलाशने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि, अभी इसके व्यावसायिक उपयोग और आर्थिक लाभ की पुष्टि नहीं हुई है। किसान फिलहाल अपनी मर्जी से यूरिया की जगह अमोनिया का इस्तेमाल न करें। इसके लिए वैज्ञानिकों की सिफारिश और सुरक्षित प्रयोग की प्रमाणित व्यवस्था जरूरी है।

परीक्षण के नतीजे सामने आने के बाद ही तय हो सकेगा कि यह तकनीक अलग-अलग फसलों और कृषि परिस्थितियों में कितनी उपयोगी साबित हो सकती है।

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